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खण्डित आज़ादी का जश्न और एक ज्वलंत प्रश्न ?

Written By Swarajya karun on बुधवार, 16 अगस्त 2017 | 11:31 pm

            दिल पर हाथ रखकर बताना - क्या कभी ऐसी इच्छा नहीं हुई कि भारत ,पाकिस्तान और बांगला देश मिलकर एक बार फिर अखण्ड भारत बन जाएं ? आज के दौर में चाहे 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत अपनी आज़ादी का जश्न मनाए ,क्या वह हमारे उस अखण्ड भारत की आज़ादी का जश्न होता है ,जो आज से 70 साल पहले था ? वह तो जिन्ना नामक किसी सिरफ़िरे जिन्न की औलाद की जिद्द और कुटिल अंग्रेजों की क्रूर कूटनीति का ही नतीजा था ,जिसके चलते भारत माता के पूर्वी और पश्चिमी आँचल में विभाजन की काल्पनिक रेखाएं खींच दी गई और भारत खण्डित हो गया ।
       देश में  आज़ादी के तीव्र होते  संघर्षों ने अंग्रेजों को भयभीत कर दिया था । तब ब्रिटिश हुक्मरानों ने जिन्ना को ढाल बनाकर विभाजन की पटकथा तैयार कर ली और लाखों बेगुनाहों के प्राणों की बलि लेकर पाकिस्तान नामक नाजायज राष्ट्र पैदा हो गया ,जिसका एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा हिस्सा पश्चिमी पाकिस्तान कहलाया ।यह एक बेडौल विभाजन था । एक ही देश के दोनों हिस्सों के बीच हजारों किलोमीटर का फासला समुद्री या हवाई मार्ग से तय करना पड़ता था । बहरहाल पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतन्त्र बंगला देश बन गया और उधर पश्चिमी पाकिस्तान अब सिर्फ पाकिस्तान कहलाता है । उस वक्त के किसी अंग्रेज हुक्मरान का इरादा था कि वह पाकिस्तान और भारत दोनों की आज़ादी के जश्न में शामिल हो ,इसलिए उसने सिर्फ अपनी सुविधा के लिए 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत की आज़ादी का दिन तय कर दिया । हमारे तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों के इस प्रस्ताव को सिर झुकाकर स्वीकार भी कर लिया ।
उनकी इसी मूर्खता का खामियाज़ा 70 साल बाद भी हम भुगत रहे हैं । आतंकवाद, सम्प्रदायवाद और अलगाववाद के दंश झेलना हमारी नियति, बन गई है ।समय आ गया है कि इस बीमारी का इलाज किया जाए । भारत ,पाकिस्तान और बांग्लादेश का एकीकरण ही इसका सर्वश्रेष्ठ और चिरस्थायी इलाज होगा ! आखिर 70 साल पहले कहाँ था कोई पाकिस्तान और कहाँ था कोई बांग्लादेश ? खण्डित आज़ादी के इस जश्न के बीच एक ज्वलन्त प्रश्न है यह !   -स्वराज करुण

अब मच्छर ही नहीं राजनेता भी खून चूसते हैं.

Written By Tarkeshwar Giri on रविवार, 13 अगस्त 2017 | 10:05 am

जापानी बुखार (एन्सेफलीटीस) मूलतः पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिम बिहार में अपना प्रकोप दिखता है वो भी  खाश करके 6 महीने से लेकर 15 साल तक के बच्चों के ऊपर / मानसून के समय जापानी बुखार के जिम्मेदार मच्छर बहुत ही ज्यादा मात्रा  में पैदा होते हैं और छोटे बच्चो को अपना शिकार बनाते हैं. 

बच्चो को मच्छरों से बचाये ; क्योंकि अब मच्छर ही नहीं राजनेता भी खून चूसते हैं. बच्चो को हमेशा पुरे कपडे पहनाये।  शहर के और गॉंव के अमीर लोग तो मच्छरों से बचने का तरीका निकाल  लेते हैं क्योंकि उनके पास पैसा और साधन है, मगर गॉंव के गरीबो के पास दो वक्त की रोटी मिल जाये वही बहुत है.

मंदिरो में धन दौलत दान करने से तो अच्छा है की पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार में गरीबो  मच्छरदानी दान दी जाये , जिसे उनके बच्चो को बीमार होने से बचाया जाय।  

गोरखपुर में ये पहली बार नहीं हुआ है , पहले योगी जी , सरकार के खिलाफ आवाज उठाते रहते थे , तो अब विरोधी योगी सरकार के खिलाफ. जनता को ये समझना चाहिए की ये राजनेता भी किसी मच्छर  नहीं , जिसको भी मौका मिलेगा वो अपनी राजीनीति की रोटी तो सकेगा ही, आप अपने आप तो तवा मत बनाइये।  खुद आगे बढिये और अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाइये।   

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Written By बरुण सखाजी on मंगलवार, 27 जून 2017 | 7:11 pm

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खेल- खेल मै खेल रहा हूँ


खेल- खेल मै खेल रहा हूँ
कितने पौधे हमने पाले
नन्ही मेरी क्यारी में
सुंदर सी फुलवारी में !
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सूखी रूखी धरती मिटटी
ढो ढो कर जल लाता हूँ
सींच सींच कर हरियाली ला
खुश मै भी हो जाता हूँ !
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छोटे छोटे झूम झूम कर
खेल खेल मन हर लेते
बिन बोले भी पलक नैन में
दिल में ये घर कर लेते !
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प्रेम छलकता इनसे पल-पल
दर्द थकन हर-हर लेते
अपनी भाव भंगिमा बदले
चंद्र-कला सृज हंस देते !
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खिल-खिल खिलते हँसते -रोते
रोते-हँसते मृदुल गात ले
विश्व रूप ज्यों मुख कान्हा के
जीवन धन्य ये कर देते
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इनके नैनों में जादू है
प्यार भरे अमृत घट से हैं
लगता जैसे लक्ष्मी -माया
धन -कुबेर ईश्वर मुठ्ठी हैं
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कभी न ऊबे मन इनके संग
घंटों खेलो बात करो
अपनापन भरता हर अंग -अंग
प्रेम श्रेष्ठ जग मान रखो
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कभी प्रेम से कोई लेता
इन पौधों को अपने पास
ले जाता जब दूर देश में
व्याकुल मन -न पाता पास !
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छलक उठे आंसू तब मेरे
विरह व्यथा कुछ टीस उठे
सपने मेरे जैसे उसके
ज्ञान चक्षु खुल मीत बनें
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फिर हँसता बढ़ता जाता मै
कर्मक्षेत्र पगडण्डी में
खेल-खेल मै खेल रहा हूँ
नन्ही अपनी क्यारी में
सुन्दर सी फुलवारी में !
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सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्र्मर ५
शिमला हिमाचल प्रदेश
२.३० - ३.०५ मध्याह्न
९ जून १७ शुक्रवार
सौ -सौ रूप धरे ये बादल





मेरी कलम रुक जाती है...

Written By Neeraj Kumar on शुक्रवार, 24 मार्च 2017 | 5:28 pm

मित्रों, 
पहली बार मैं इस ब्लॉग पर अपना योगदान दे रहा हूँ. मुझे माफ़ करेंगे आप सभी साथी और पाठकगण, ऐसी आशा है. 

जीवन की उलझनों में ऐसा उलझा कि कविता को समय ही नहीं दे पाया. जाने कहाँ गए वो दिन? जाने कहाँ गया वो जूनून? जाने कहाँ गयी वो लगन? शब्द ही खो गए मेरे ह्रदय के. 

एक नए जोश के साथ आया हूँ इस बार, इस संकल्प के साथ कि अब तो लिखूंगा, बहुत लिखूंगा, निरंतर लिखुंगा। हिंदी का दास हूँ चाहे अपने नाम से पूर्वजों के "दास" टाइटल को हटा दिया है मैंने. 

इस बार मैं एक पुरानी कविता "मेरी कलम रुक जाती है" को विडियो के रूप में पुनः जीवित किया है जो यहाँ शेयर कर रहा हूँ. विनम्र निवेदन है की इसे सुने, गुणे और मेरा मार्गदर्शन करें... 



मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई कहता है

भूख लगी है

पैसे दे दो...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

मैं देखता हूँ

छोटे से बच्चे को

चाय की दूकान पे

काम करते...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई सिमटी सिकुडी लड़की

किनारे से गुजरती है

सर झुका कर

भीड़ से बचकर...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई रिक्शा वाला

दस के बदले पाँच पाकर

खड़े होकर

देखता है चमकते सूट को...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

एक पुलिस वाला

सलाम करता है

किसी गाड़ी वाले को...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

अखबार में छपती है

हत्या, लूट, बलात्कार की

युद्ध, राजनीति, उठा-पटक की

रोज-रोज खबरे एक-सी...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

लगता है

शब्दों के बाण

कविता का मलहम

या गीत के सरगम

बदल नहीं सकते

तुझे, मुझे या उन्हें

न आत्मा, न परमात्मा

न भूत को, न भविष्य को...

Founder

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Saleem Khan