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यूँ जिस्म को, छोड़ते हुए, किसी की रूह को देखा है,

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 27 अगस्त 2011 | 12:53 pm

अब तो दिल बैठा जाता है,
तेरे बिना न रहा जाता है,
तू जल्दी से चली आ रे,
नहीं तो रुखसत हुआ रे,

बद्खुलूसवार हुकुम सुना तो दिया,
तामीर करे न करे, ये बता तो दिया,

अह्सासे-हुज़ुरियत का इन्तखाब,
बज्में खायियत की जिन्दगी न थी,
उस रूह न निकली हर नज़्म,
तेरी नजरियत की जिन्दगी न थी,

इन मह्ताबों से, मरकजों की खातिर,
इन फब्तीनों से, नज़रनूरों की खातिर,

रूह तो कब की चली गयी,
जिस्म अभी पड़ा है,
न टटोल उसे इस तरह,
क्यों अभी खड़ा है,

यूँ जिस्म को, छोड़ते हुए,
किसी की रूह को देखा है,
झटका-सा लगते हुए,
रोमा-रोमा कांपते देखा है,

ये मोहब्बत है की फ़ना हो जाती है,
इज्जत की खातिर,
न सोचती न समझती है, मर जाती है,
लाज की खातिर,

कशमकश की जिन्दगी में,
इसकी सुनूँ की, उसकी सुनूँ,
दिल की दिल में रहने दूँ,
या सारे जहाँ से कह दूँ,

मजबूर दिल का क्या करें,
कदम अपने-आप उधर चलें,
रोकने से अब वो क्या रुकें,
सर-ए-कलम की परवाह न करें,

इख्तियाले हुश्न,
न ये तेरा मतला,
तेरे पैमाने की,
पैमाईश से गुज़र सका,

मशहूर होते-होते,
दिन गुज़र गए,
तेरी नज़र से,
न गुज़र सका,

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